रविवार, 29 जनवरी 2012

स्वास्थ-मंत्री का तालिबानी बयान....


शायद किसी ने गलत नहीं कहा है की सत्ता का ताकत के आगे अच्छे अच्छे बौने साबित हुए है ! जी हाँ ऐसा ही कुछ बिहार के मुख्यमंत्री के एक मंत्री ने एक नया कारनामा कर दिखाया ...जिस मंत्रियो और अधिकारीयों के कारण सूबे के मुख्यमंत्री को कभी गर्व हुआ करता था आज उन्ही मे से एक मंत्री के कारण न सिर्फ नितीश कुमार को विरोध झेलना पड़ रहा है वहीँ कहीं न कहीं विपक्षी दलों को एक नया मौका मिल गया है ! जी हाँ सूबे के स्वास्थ मंत्री अश्विनी चौबे ने शनिवार को प्रदेश मे सभा को संबोधित करते करते उन्होंने कहा की अगर राज्य के जूनियर डाक्टर अपनी मांगो को लेकर हड़ताल पर जाते है तो उससे निपटने के लिए हमारी सरकार चुप नहीं बैठेगी ओर यहाँ तक कह डाला की धमकी देने वालो के हाथ भी काट दिया जाता है..बहरहाल उनके इस बयान पर जूनियर डाक्टरों में काफी रोष है ओर डाक्टरों का कहना है की स्वास्थ मंत्री को अपने दिए बयान के लिए माफ़ी मांगना चाहिए वरना इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा!!
पर इन सब के बीच सवाल ये उठता है की क्या मंत्री के द्वारा दिया गया ये बयान सही है? और क्या फिर मंत्री जी को जनता की सेवा करने के लिए डाक्टरों का हाथ काटना जरूरी है ? क्या देश में लोकतंत्र नहीं है की अपनी बात रख सके या फिर विरोध कर सके ? जिस हिसाब से मंत्री ने तालिबानी अंदाज़ में अपना ये फैसला सुनाया है वो कहीं न कहीं सरकार की छवि को भी धूमिल कर रहा है! आज यही वो नेता है जब शरद पवार को थप्पड़ मारा गया था तो आपस मे एकता की बात कर रहे थे और इसे हिंसा करार दिया था ! जब देश भ्रष्ट्राचार के खिलाफ सड़क पर उतरा था तो यही नेता कहीं न कहीं लोकतंत्र की दुहाई दे रहे थे! पर आज ऐसा क्या हुआ की बिहार में जब जूनियर डाक्टरों ने अपने वेतन में सुधार और अपनी मांगो को लेकर अनशन पर जाने की बात कही तो मंत्री ने मानो समझाने की जगह या फिर अहिंसा की जगह वो मार काट करने पर उतर गए? क्या यही उनकी गरिमा है या फिर यही उनकी शिक्षा है? कल तक इन्हें आम जनता अपने प्रतिनिधि के रूप में देखते है पर अब यही नेता खुले आम इंसानियत का क़त्ले-आम करने पर आमदा है तो फिर इनसे भी क्या अपेक्षा की जा सकती है? बहरहाल इन सब के बाद भी मानो मंत्री जी को किसी तरह का कोई अफसोश नहीं है और एक न्यूज़ चैनेल पर बातचीत के दौरान जब सफाई दे रहे थे तब भी उनके तेवर कम नहीं हुए और कहा की मेरे बयान को गलत समझा गया है मैंने मुहावरा दिया था! और फिर इसी के साथ वही तेवरों मे कहा की धमकी कतई बर्दाश्त नहीं होगी ..अब बात यहाँ पर यह उठती है की कल तक सुशाशन पर गर्व करने वाले नितीश कुमार अश्विनी चौबे के ऊपर कोई कठोर करवाई करते है या नहीं ? शायद आम जनता के लिए लोकतंत्र का मतलब मात्र पन्नो में सिमटता दिख रहा है ! क्यूंकि ये नेता आग उगलने से बाज नहीं आएंगे क्यूंकि ये जो चाहे वो कर सकते है पर आम जनता पर हमेसा करवाई क्यों की जाती है क्यों नही ऐसे नेताओ पर कारवाई की जाती है जो देश में तालिबानी पैंतरे अपना रहे है !


फोटो -खबर. एनडीटीबी .कॉम

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

किसको मिलेगा ताज???


उत्तर प्रदेश की सियासी गलियों में अब भी उलट फेर ख़त्म होता नहीं दिख रहा है ...वैसे भी पार्टी छोड़ना ओर बागी होना इन सफेदपोशो की बड़ी पुरानी आदत सी है जब जब चुनावो का एलान हो जाता है तब से ये नेताओ का भी भाव बढ़ जाता है..ओर फिर ज्यादातर या तो अपने पार्टी के खिलाफ ही बागी तेवर अख्तियार कर लते है तो वहीँ दुसरे नेता पार्टी छोड़ कर अदला बदली करने में जुट जाते है ओर अपना अपना सुरक्षित जगह बनाने में लग जाते है..वैसे नेताओ का वादा किसी दिन में देखे गए या खुले आँखों से देखे गए सपने से कम नहीं होता है ! ठीक ऐसा ही हाल उत्तर प्रदेश की सियासी जगत में चल रही है जहाँ जब से चुनावों की तारीखें घोषित हुई है तब से सारे राजनीतिक दल अपने अपने वोटरों को लुभाने के लिए नए नए घोषणा पत्र तैयार करने में जुट गए है ..जहाँ एक समय कंप्यूटर का विरोध करने वाली समाजवादी पार्टी को इस चुनाव में कंप्यूटर के रास्ते ही जीत नज़र आ रहा है तो वहीँ दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के घोषणापत्र में इस बार भी राम मंदिर शामिल है ...इन सब के बीच में कांग्रेस के युवराज तो मानो पूरी तैयारी करके उतारे है मैदान में तभी तो उन्होंने कहा की हमें ५ साल दे हम यु.पी का चेहरा बदल देंगे ! वहीँ सूबे की मुखिया को चुनाव आयोग के द्वारा हाथियों की मूर्ति ढंकने का फैसला ही खाए जा रहा है तभी तो चुनाव आयोग को हल्के में लेते हुए बहन जी ने सीधे सीधे कह दिया की खुला हाथी एक लाख का ओर ढंका हाथी सवा लाख का मुखिया का दिया ये बयान उनको भरी पड़ गया ओर चुनाव आयोग ने नसीहत दे डाली की आगे से सोच समझकर बोले ! वही राज्य के छोटे छोटे रूप में उभर कर आ रहे राजनीतिक दल भी बी.एस.पी , सपा , बी.जे.पी और कांग्रेस के लिए काफी सर दर्द के रूप मे बनकर उभर रही है !वहीँ चुनाव आयोग की कडाई के कारण राज्य में लगातार पैसो के बरामदगी का भी सिलसिला जारी है और जिससे इस बात का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है की ये प्रजातंत्र को कैसे इन नेताओ ने नोट-तंत्र में बदल दिया था!इस बार चुनाव न सिर्फ उत्तर प्रदेश के जनता से जुड़ा है बल्कि कही न कहीं सत्ता में परिवर्तन को लेकर भी कयास लगाया जा रहा है! और राजनीतिक जगत मे एक बहुत पुराना कहावत कहा गया है की दिल्ली का रास्ता यु.पी होकर ही जाता है इसलिए ये कहना गलत नहीं होगा की ये २०१४ लोकसभा चुनावो से पहले ये एक तरह से सेमी-फाईनल है जहाँ पर हर राजनीतिक दल जीत के लिए अपने अपने हथखंडे अपनाने में लगे हुए है और इसी के साथ कांग्रेस के राजकुमार का भी राजनीतिक करियर पूरी तरह यु.पी चुनाव पर टिका हुआ है इसलिए कांग्रेसी कार्यकर्ताओ समेत दिग्गज नेताओ ने राहुल के करियर को बचाने के लिए पूरी प्रयास करते नज़र आ रहे है ! इस चुनावो में कई दिग्गजों के प्रतिष्ठा भी दांव पर है जहाँ एक और ताबड़तोड़ एन.एच.आर.एम घोटाले की जाँच मे लगातार नए नए तथ्य सामने आ रहे है तो वही दूसरी और सरकार और अन्य राजनीतिक दलों के द्वारा लगातार नए नए प्रलोभन जनता के सामने पड़ोसे जा रहे है देखना तो यह होगा की क्या जनता अपने मत का सही प्रयोग करके राज्य को विकास की और मोड़ती है या फिर चुनावी वादों में आकर उलझ कर मात्र रह जाती है ....ये तो अब आने वाला वक़्त ही बताएगा!

फोटो -हिंदी. वन इण्डिया.इन

बुधवार, 25 जनवरी 2012

अपनों से हारा राष्ट्रीय धव्ज हमारा....


बचा लो मुझे बचा लो मुझे ....एक पल को लगा कोई मुझसे मदद मांग रहा है पर जब पीछे मुड़ कर देखा तो कोई नहीं था फिर में ज्यों ही अपने कदमो को आगे बढ़ने जा रहा था मुझे फिर से अचानक वही चीखें सुनाई दी इस बार में पीछे मुड़ा तो देखा की सड़क के एक छोर पर हमारे देश का राष्ट्रीय धव्ज अपने रिहाई के लिए तड़प रहा था ...में धीरे धीरे आगे बढ़ा और फिर धव्ज को हाथो से उठाया और पुछा की क्या बात है आज तो देश गणतंत्र दिवस के ६३वे वर्षगांठ की खुशियाँ मना रहा है और तुम्हारी आँखों में आंसू क्यों है क्या तुम खुश नहीं हो ? जवाब में धव्ज ने कहा की अगर तुम्हारी क़द्र सिर्फ एक दिन की जाये तो क्या तुम खुश रहोगे उसके इस जवाब में काफी दर्द था ..उसने आगे कहते हुए कहा की अब मेरी अहेमियत लगातार घटती जा रही है ...पहले हर माँ बाप अपने बच्चे को मेरे बारे में बताते थे और फिर में भी बच्चो के हाथों में जाकर काफी खुश होता था पर अब माँ बाप तो मुझे अपने बच्चो के हाथ में तो क्या मेरे बारे में भी नही बताते है...अब तो तुम मुझे सड़को पर फेंके हुए हाल में देख सकते हो! क्या मुझे कष्ट नहीं होता है ?न जाने क्यों उसकी बातों को सुनकर में स्तब्ध सा रह गया और फिर मैंने पुछा की कुछ भी हो पर आज भी हमारा देश जब क्रिकेट में वर्ल्ड कप जीतता है तो खुशियों में तुम्हे फ़हराया जाता है तो क्या तुम खुश नहीं हो इससे ? तिरंगे ने तुरंत पलटवार करते हुए कहा की तुम ये क्यों भूल जाते हो की देश के गद्दार नेताओ के मरने पर मुझे शोक में भी झुकाया जाता है तब मुझपर क्या बीतती है तुम्हे क्या पता ...उस वक़्त तो मुझे भी लगता है की में आजाद क्यों हुआ? तभी मैंने पुछा की तुम्हे बुरा किस बात का सबसे ज्यादा लगता है और क्या लगता है की तुम्हारे इस हाल के पीछे आम जनता का हाथ है? अभी मैंने पूरा प्रश्न पुछ भी नहीं पाया था की तिरंगे ने कहा की बिल्कुल आम जनता के कारण ही मेरा हाल ऐसा हुआ है क्यूंकि जनता ने जब से दागियो बलात्कारियो और भ्रष्ट्राचारियो को अपना प्रतिनिधी चुनकर नेता बनाया है तब से वही दरिन्दे मुझे अपने हाथों से फेहराते है तब मुझ पर क्या बीतती है तुम्हे क्या पता? अब न जाने क्यों मुझे ऐसे लगने लगा था की कहीं न कहीं में भी दोषी हूँ तिरंगे के उसके इस हाल के लिए ...तिरंगे ने कहा की मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है बस मुझे भी आज़ादी चाहिए क्यूंकि अब मुझमे वो क्षमता नहीं है की में अपने आँख के आगे भ्रष्ट्राचार होते देखू ओर न ही मुझमे अब इतनी शक्ति है की मैं गद्दारों के मौत पर अपने आप को झुका हुआ देख सकूँ ! मैंने कहा की पर ज्यादातर इंसान तो तुम्हे सीने से लगाते है अपने दिल मैं बसाते है तो फिर तुम क्यों इतने उदास हो इस पर तुरंत तिरंगे ने जवाब दिया की जब विरोध करना होता है तब मुझे जला भी दिया जाता है ...अब तिरंगे ने साफ़ साफ़ शब्दों मैं बोल दिया की इंसान इतने स्वार्थी हो गए हो अगर तुम्हे जरुरत पड़ी तो तुम मुझे भी बेच दोगे ...और तुम इंसानों के अन्दर देश भक्ति सिर्फ एक छलावा है ताकि तुम इंसान अपनों को ही धोका दे सको की तुममे देश भक्ति है पर मैं पिछले ६३ सालो से तुम इंसानों को बदलते हुए देख रहा हूँ सोचता हु की तुम इंसानों मैं अपना आत्मा सम्मान नाम का कोई चीज़ ही नहीं है आज भी ग़ुलामी भरी जिंदगी जी रहे हो ...अब मेरे पास तिरंगे को जवाब देने के लिए कुछ नही था मैंने उससे पुछा की कहाँ छोड़ दू आपको तो इसपर तिरंगे ने नम आँखों से यही कहा की अगर छोड़ना है तो मुझे आज़ादी दिलवा दो ताकि मैं सुकून भरी सांस ले सकूँ क्यूंकि मैं खुली फिजा मैं साँस लेना चाहता हूँ न की इन गद्दारों के हाथों फ़हराए जाना चाहता हूँ ...क्या तुम दिला सकते हो मेरी आज़ादी? उसके प्रश्न का तो जवाब मेरे पास भी नहीं था पर हाँ उसके प्रश्नों ने मेरी आँखें जरुर खोल दी अगर अब भी हमारे अन्दर राष्ट्रीय धव्ज के प्रति कोई भी प्रेम है तो उसके आंसू को हम और आप पोछ सकते है इस गणतंत्र दिवस हमे और आपको सभी को ये संकल्प लेना होगा की हम अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे और दागियो को अपना प्रतिनिधी नही बनायेंगे और राष्ट्र धव्ज का अपमान होने से बचायेंगे !!!

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

राजनीती में सफाई कार्यक्रम....


उत्तर प्रदेश की राजनीति जगत में उठी सफाई मानो अब थमती नज़र न आ रही हो और लगातार सूबे के कई मंत्रियो माननीयो और सांसदों पर सूबे की मुखिया जिस हिसाब से ठोस करवाई कर रही है उससे आम जनता के अन्दर एक ही सवाल उठ रहा है की आखिर चुनावो के ठीक कुछ दिनों पहले ये सफाई क्यों शुरू हुई ?जहाँ लगातार सूबे के मंत्रियो पर भ्रष्ट्राचार के संगीन आरोप लगे तो करीब डेढ़ दर्जन से ज्यादा मंत्रियो को इन आरोपों में पाए जानने के बाद इश्तिफा देना पड़ गया है और ये सिलसिला अभी भी जारी है ...पर इन सब के बीच में अगर गौर से देखा जाये तो कई ऐसे चेहरे है जो एक वक़्त में सूबे की मुखिया के सबसे खास और विश्वश्नियो में से एक थे ! उनके कारण समाज का एक तबका का वोट पूरी तरह उनपर काबिज़ था .. इसी कारण से प्रदेश के कई महत्वपूर्ण विभाग की कमान उनके हाथ में थी! ठीक इसी प्रकार और भी कई ऐसे अनगिनत चेहरे है जिन पर भ्रष्ट्राचार के आरोप लगने के बाद सूबे की मुखिया ने इस्तीफा ले लिया है..इस दौरान सूबे के राज्य मंत्री ने तो मानो लोकायुक्त को ही चुनौती दे डाली की सूबे के लोकायुक्त को कानून की थोड़ी कम जानकारी है ! बहरहाल इस मुद्दे पर निर्वाचन आयोग ने इस मुद्दे पर रिपोर्ट मांगी है ! वहीँ दूसरी ओर राज्य के एक बर्खाश्त मंत्री ने तो मानो अपनी भावनाओ पर काबू ही नहीं कर पाए और जनता के बीच पहुँचते ही फुट -फुट कर रो पड़े और बयां किया की पार्टी के लिए उन्होंने जान तक लगाया बदले में उन्हें क्या मिला ? आज चनावो के नजदीक आते ही और इस बढ़ते आपा- धापी के बीच में कई बर्खाश्त नेताओ ने समय रहते अपनी नैया को पार लगाना ही उचित समझा और झट-पट दुसरे दलों के साथ हो लिए...पर इन सब के बीच में कई चीज़े ऐसी है जो कहीं न कहीं अपने आप में प्रश्न उठाती है की आखिर ऐसा क्या हुआ की एका-एक उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस्तीफों की झड़ी सी लग गयी ? और जो भ्रष्ट्राचार के आरोप में नेताओ को मायावती ने पनाह दी थी क्या इसके बारे में उन्हें पहले से अभास नहीं था ? इस भ्रष्ट्राचार में सिर्फ इन नेताओ का ही हाथ ही था या इनके पीछे इनको पनाह देने वालो को भी हाथ था ? बहरहाल अब जो भी हो सूबे की मुखिया ने जिस हिसाब से ताबड़तोड़ फैसले लिए है वो आम जनता को कहीं न कहीं जरूर समझ में आने लगा होगा ! कल तक अपने मंत्रियो की तारीफ करने वाली सूबे की मुखिया आज इनके कारनामो के कारण लगातार जनता और विपक्ष का विरोध झेल रही है !देखना तो ये होगा की क्या आने वाले विधान -सभा चुनावो में बसपा सुप्रीमो को उनके द्वारा की गयी सफाई का कोई फायदा पहुँचा पाती है या फिर उनको कोई सबक सिखाएगी ? वैसे भी बसपा सरकार के कार्यकाल के दौरान इनके कई माननीयो ने सत्ता में रहते हुए अपने पद का दुरुपयोग किया था! वर्तमान समय में सरकार किसानो का तो विरोध झेल ही रही है वहीँ दूसरी ओर विपक्ष के विरोध के साथ अब मायावती के खिलाफ खुद उनके पार्टी से बर्खाश्त नेता व विधायक उतर गए है ! आने वाला वक़्त ही बताएगा की सुप्रीमो की पार्टी में सफाई से क्या जनता सरकार को वापस सत्ता में बैठाएगी या फिर कहीं ऐसा न हो जाये की जनता सत्ता से इनका भी सफाया कर दे...अब ये तो आने वाला वक़्त ही बताएगा !


फोटो -myindiapictures.com

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

चढ़ गया आग की भेंट लोकपाल...

राज्य-सभा में राज्यसभा सदस्यों को अन्ना के अनशन के खिलाफ आग उगलते देखा और उनकी ईमानदारी देश के प्रति भी देखी एक पल को तो विश्वास नहीं हो रहा था की हम उस देश के वासी है जहाँ पर लगातार पिछले कुछ दिनों से सफेदपोशो पर भ्रष्ट्राचार के कई गंभीर आरोप लग रहे है और बड़े बड़े घोटाले सामने आ रहे थे...यूँ तो एक पल लगा मानो मैं एक ख्वाब देख रहा हूँ पर अचानक ही सारे माजरे समझ में आने लगे जब आर.जे.डी. के एक सदस्य ने भरे राज्य सभा में अपनी मर्यादा का ख्याल न करते हुए लोकपाल बिल की प्रति नारायण स्वामी के हाथ से छीन कर फाड़ दी !!बिल तो संसद में जरूर लटका रहा पर कल तक जो अन्ना के अनशन पर कई सवाल उठा रहे थे वो आज खुद कटघरे में खड़े दिख रहे है !!!एक महोदय ने ये कहा की उनके ३३ साल के राजनीतिक कार्यकाल में टीम अन्ना या कोई भी टीम का सदस्य एक आरोप भी साबित करके दिखाए मैं राजनीती से इस्तीफा दे दूंगा पर इसी के साथ वो लोकपाल का विरोध करके साफ़ कर दिया की वो कितना देश के प्रति गंभीर है! नेताओ को अन्ना का ये बयां बड़ा बुरा लगा की वो सफेदपोशो के बारे में सड़क पर आग उगल रहे है पर शायद वो भूल गए की आग उगलने वालो में अन्ना ही नहीं बल्कि भारत का हर वो एक आम आदमी है जिसने आपको वहां तक पहुँचाया है !बहरहाल आज देश के एक केंद्रीय मंत्री ने अन्ना को ये हिदायत दे दिया की वो कभी उनके क्षेत्र में जाये तब पता चलेगा...ओर तो ओर इसी तरह कई अन्य महानुभावो ने लगातार अन्ना पर हमला जारी रखा और एक तरफ लोकपाल पर भी दोहरी नीति अपना रखी थी ...अब जब बिल पास नहीं हो पाया तो विपक्ष सत्ता पक्ष पर हमला कर रहा है वहीँ दूसरी ओर सत्ता पक्ष विपक्ष पर हमला करना तेज़ कर दिया है !पर जिस हिसाब से ये सफेदपोशो ने राज्य सभा और लोकसभा में अपनी गरिमा पर लग रहे आरोपों पर अन्ना पर हमले किये थे ओर उसके बाद खुद मर्यादाओ को भूल कर लोकपाल बिल फाड़ा था उससे तो यही जाहिर हो रहा है की चाहे वो सत्ता पक्ष हो या विपक्ष अब सब एक ही धुन अलाप रहे है की चाहे जो भी हो जाये पर लोकपाल पास न हो इसके लिए बकायदे उन्होंने दोहरी नीति अपना रखी है ! शायद ये सफेदपोश भूल गए है की जनता जनार्दन है अगर ये जनता को मुर्ख बनाना जानते है तो जनता भी इनको इनके ही अंदाज़ में जवाब दे सकती है बस जनता अब सही वक़्त का इंतज़ार कर रही है ...कल संसद में कुछ सदस्यों ने कहा की आपको किसी इंसान से डरने की जरुरत नहीं है और न ही आपको किसी दवाब में आकर बिल लाने की जरुरत है आप अपने हिसाब से काम करो !!! कुछ बुद्धिजीवी सांसदों ने तो साफ़ तौर पर कह दिया की ये एक तरह से लोकतंत्र में हमारे लिए सुशायडल से कम नहीं है ...और तो और ये भी कहते नज़र आते है की ये लोकतंत्र की हत्या हो रही है हम पर आरोप भी लगाये जा रहे है ...अगर आपको आरोपों से इतना बुरा लग रहा है तो फिर आप अब तक संसद में लोकपाल पर अपनी भुमिका स्पष्ट कर दीजिये ...क्यूंकि आप को अगर ये लगता है की संसद में कानून बनता है तो आम जनता पिछले ४२ साल से देख रही है की कितना मेहनत आपने लोकपाल मुद्दे पर की है..!अगर आपने ये काम पहले ही कर दिया होता तो शायद आम जनता को सड़क पर न उतरना पड़ता ओर न ही अन्ना को अनशन करने की..और आप है की समझते ही नहीं है हर जगह आरक्षण को लाकर राजनीतिक मुद्दा बना देते है अरे जनता भ्रष्ट्राचार से पीड़ित है मगर आप उसपर मरहम लगाने की बजाए आप उसपर जात-पात के नाम पर और दर्द देना चाह रहे है !आपको अपनी इज्ज़त का तो बड़ा ख्याल है पर आप आम जनता को क्यों भूल जाते है की आम इन्सान को जन्म से लेकर मृत्यु तक के लिए घूस देना पड़ रहा है तो आम जनता का गुस्सा जायज़ क्यों नहीं है? फिर अगर आम जनता विरोध करती है तो बदले में लाठी खाती है या फिर जेल की हवा ! आप लोग इस पर भी राजनीती करने पर उतर जाते है ...आपकी महानता तो अब देख ही रहे है की एक लोकपाल पर आप सभी राजनीतिक दलों ने कैसे एकता और भाई चारा दिखा दिया और बिल को फिर से लटका दिया फिर आम जनता को आपने अपने राजनीतिक फायदों के लिए मुर्ख बना दिया... जहाँ तक मेरा ख्याल है की अब हमे नहीं लगता है की हमारे देश में कोई सत्ता पक्ष या विपक्ष या कोई अन्य राजनीतिक दल है क्यूंकि आप सभी एक ही थाली के चट्टे-बट्टे है ! आपसे बस देश बेचने की ही उम्मीद की जा सकती और गरीब को मिटाने की न की गरीबी को !!!सच कहा है किसी ने की संसद से बड़ा कोई नहीं पर आपने तो ये साबित कर दिया की सांसदों से बड़ा कोई नहीं!!

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

आरक्षण पर विवाद

भारत में आरक्षण को लेकर हमेशा ही विवाद चला आ रहा है जो की शायद ही कभी रुकने से रुके...जैसे जैसे ५ राज्यों के विधानसभा चुनावो की तिथियाँ नजदीक आ रही है वैसे वैसे सारे राजनितिक दल अपने लुभावने पत्ते जनता के सामने बिछा रहे है! और इस बार भी आम जनता को सिर्फ आरक्षण के नाम पर फुसलाया जा रहा है !इसका सबसे बड़ा उदाहरण जन लोकपाल मुद्दे में आरक्षण के दौरान देखने को मिला जहाँ सारा देश भ्रष्ट्राचार की लडाई लड़ रहा है वहीँ इन सफेदपोशो को इसमें भी आरक्षण दिखने लगा और इस भ्रष्ट्राचार के खिलाफ उठी आवाज़ को कहीं न कहीं आरक्षण के नाम पर दबाने की कोशिश कर रहे है....पर ये बात यही ख़त्म नहीं होती है ! मेरा सवाल है की आरक्षण सिर्फ जात-पात के आधार पर ही क्यों मिलता है? क्या ऐसे आरक्षण से कोई फायदा है ? आज हम अच्छी तरह से वाखिफ है की हमारे देश में प्रतिभाशालियों की कमी नहीं है बस अंतर यह है की उनको सही मार्ग और दिशा नहीं मिल पा रहा है जिसके पीछे सिर्फ एक कारण है और वो मुख्य कारण उनकी गरीबी और सिर्फ गरीबी ....तब कहाँ चले जाते है आरक्षण के रखवाले जब एक प्रतिभासाली को मंच नहीं मिल पाता है ? और आरक्षण तो दूर की बात अगर सही मायनो में आरक्षण को देखा जाये तो ये सिर्फ अमीरों के लिए बना है! क्या आज राज्यों की सरकार और केंद्र सरकार को पता है की आरक्षण के नाम पर कितनी धांधलिया चल रही है ?..कहने को तो आरक्षण पिछडो को आगे लाने के लिए था और उनके विकास के लिए था पर आज ये सिर्फ नेताओ के लिए एक चुनावी मुद्दा बन कर रह गया है !जिसको देखो वही देश के बंटवारे में पूरी तरह लग गया है ! अगर बंटवारे से इतना प्रेम हो गया है तो शिक्षा जगत में बच्चो को सिखाई जाने वाली ये पंक्ति का प्रयोग करना बंद कर दो "हम एकता मैं विश्वास रखते है "..क्यूंकि इसी आधार पर बच्चे एकता की परिभाषा समझते है और अंत में आपके आरक्षण के नाम पर उसकी पूरी मेहनत मिट्टी में मिल जाती है ...आज आपके इस आरक्षण के कारण कितनो ने आत्म हत्याएं की होंगी तब आप कहाँ रहते है?
आरक्षण गलत नहीं है पर आरक्षण के नाम पर जो आप इंसान के भावनाओ और उनके प्रतिभाओ से खिलवाड़ कर रहे है वो काफी कष्टदायी है ....वैसे भी हमारे देश धर्म की आग मैं झुलस रहा है इसको आप जैसे सफ़ेद पोश नेताओ ने अब आरक्षण की आग में भी झुलसाने को तैयार कर दिया है !!कल एक इंसान जो की अपनी मेहनत और परिश्रम के बल आगे आना चाहता है उसे आप आरक्षण के नाम पर शहीद करा देते है !!या तो सबको एक सामान अधिकार दे दीजिये या तो फिर इतनी मेहरबानी कर दीजिये की आप गरीबो के लिए आरक्षण बनाइये जिनको आपके इस घटिया राजनीती के कारण लाखो प्रतिभा होने के बाद भी दर दर भटकना पड़ रहा है !!! चुनाव करीब आया तो एका-एक आप दलित ओर अल्पसंख्यक को लुभाने के लिए नए नए पैंतरे अपना रहे है ! अरे दो दिन किसी गरीब के यहाँ रहने से या फिर खाने से विकास नहीं होता है इतना हमदर्द है तो उस गरीब के बच्चो की शिक्षा के लिए नए नए कालेजों का निर्माण कराइये!!! आरक्षण के नाम पर आप अमीरों को और अमीर मत बनायिए और कहीं ऐसा न हो जाये की आप खुद देश को दो भाग मैं बाँट दीजिये अपनी गन्दी राजनीती के कारण ! शायद आपका आरक्षण सिर्फ अमीरों के लिए है न की गरीबो और पिछडो के लिए ....इसलिए आरक्षण को देने से पहले आप उसमे सुधर जरुर कीजिये!!!

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

संसद हमले के वो दस साल

आज से ठीक १० साल पहले जब हमारे संसद मैं बैठे सांसद शीत-सत्र में भाग ले रहे थे तब उन्होंने भी सपने में भी नहीं सोचा होगा की उनकी सुरक्षा मैं सेंध हुयी है...जी हाँ इस बार ओर कोई नहीं चंद आतंकियों ने देश के लोकतंत्र का मंदिर कहे जाने वाले सांसद पर हमले कर दिए ओर ये हमले बड़े ही सुनयोजित तरीके से रची गयी थी ओर जब हमला हुआ तब ज्यादातर सांसद उस वक़्त संसद में ही उपस्थित थे...ओर उस समय संसद में उपस्थित जाबांज सुरक्षा-कर्मियों ने अपने जानो की परवाह किये बिना ही अपने प्राणों का बलिदान दिया...ओर इस दौरान दिल्ली पुलिस के ५ कर्मचारी , केंद्रीय सुरक्षा बल की एक महिला सुरक्षाकर्मी ओर संसद के दो गार्ड समेत एक माली को अपनी जान गवानी पड़ी !!पर उन्होंने उन आतंकियों को उनके मंसूबे पर कामयाब होने नहीं दिया ...ओर मौके पर आये ५ आतंकियों को मार गिराया !! इस दौरान मामले की जाँच पड़ताल में अफज़ल गुरु समेत ४ अन्य आरोपियों को दोषी पाया गया ओर उन्हें फाँसी की सजा हुयी पर अफसोश इस बात की ये फांसी अब तक इन लोगो को नहीं हो सकी ओर ये अब तक जिन्दा है ओर राष्ट्रपति से अपनी दया याचिका की भी मांग की है !! ओर वही सफेदपोश जिनको बचाने में ये सुरक्षाकर्मी शहीद हुए आज उनके हत्यारे अपनी दया याचिका की मांग की है जो की राष्ट्रपति के पास विचारधीन पड़ा है !!!आज लोक सभा ओर राज्य सभा के दोनों सदनों ने इस मुद्दे पर गहरा शौक व्यक्त किया ओर तमाम सांसदों ने श्रधांजली अर्पित किया ओर गहरा दुःख प्रकट किया ...पर इस बार इन शहीदों के परिवार से कोई भी व्यक्ति इस संसद में श्रधांजली के दौरान नज़र नहीं आये...जिस हिसाब से लगातार पिछले १० साल से हमारे देश की राजनीती के कारन इन शहीदों का अपमान किया जा रहा है वो अब बर्दाश्त से बाहर है !!!आखिर कब तक हम अपने देश में ऐसे गद्दारों को पाल रखेंगे !!वैसे तो आज कल काफी नेता जनता को ये समझाते हुए देखे जा सकते है की कानून संसद में बनता है न की सड़क पर !!पर जब पिछले कुछ सालो से संसद पर हमला करने वाले आतंकियों को अब तक फांसी नहीं हुयी तो आम इंसान का गुस्सा लाज़िमी है !!ओर इस दौरान अगर आम इंसान सड़क पर बैठता है इन आतंकियों को फाँसी की मांग करने के लिए तब ये नेता बड़े बड़े बाते क्यों बताने लगते है !!!अगर इन नेताओ को उन आतंकियों से इतनी हमदर्दी है तो अपनी सुरक्षा में मिले जवानो को साथ लेकर क्यों चलते है ??आखिर संसद में फाँसी का मुद्दा क्यों नहीं उठाया जाता है ऐसे आतंकी के लिए ?? ओर क्या ये सफेदपोश इतने मतलबी हो गए है की इनकी जान बचानेवाले शहीदों को इनाम के तौर में ये इनके हमलावरों को पाल रखे है !!अरे हम सभी को पता है की कानून संसद में बनता है पर आप जैसे सफेदपोशो के कारन आम जनता सड़क पर उतर जाती है जब आप देश से गद्दारी करना शुरू कर देते है!!इसलिए देश पर हुम्ला या चोट करने वाले को पालने की बजाए उनको उनकी हैसियत बतानी चाहिए ताकि भविष्य मैं ऐसा करने से पहले इन गद्दारों ओर आतंकियों का रूह कॉप सके!!