मंगलवार, 29 नवंबर 2011

वो तीन साल का दर्द...


हाँ मैं हु जिन्दा मगर मेरा जख्म अभी भरा नहीं ....क्यूंकि देश को चोटिल करने वाला अभी मरा नहीं ....हाँ मैं हु जिंदा पर जख्म अभी भरा नहीं !!,

ठीक तीन साल पहले मुंबई पर जब आतंकी हमले हुए थे तो न जाने कितने बेगुनाहों को अपनी जान गवानी पड़ी ओर तो ओर कई बच्चे अनाथ हुए तो कईयों के मांग उजड़े थे...हमेसा की तरह मायानगरी कही जाने वाली मुंबई पर न जाने किसकी बुरी नज़र लगी की चंद इन्सान के रूप में छिपे भेड़िये ने पूरी मुंबई को दहलाने के लिए अलग अलग जगहों पर आतंकी हमले कर दिए....ओर वो हुआ जो शायद भारतीय इतिहास में कभी भूला नहीं जा सकता है !आज पूरे तीन साल हो गए ओर मुंबई आज फिर से धीरे धीरे विकास की ओर आगे बढ़ गयी है ओर फिर से वोही शोर शराबे सुनाई देने लगे है जहाँ पर तीन साल पहले ठीक २६/११ के दिन दर्द ओर मदद की चीखे सुनाई दे रही थी...पर शायद अब बढती इस आप धापी के बीच मैं मुंबई की वो दर्द भरी आवाज़ कहीं न कहीं थमती चली जा रही है ...आज मुंबई दिल ही दिल मैं रो रही है फिर भी उसके आंशु कोई नहीं पोछने वाला है...ये वो मुंबई है जो हमेसा अंधेरो मैं भी चमकती रहती है पर अब मन ही मन अंधकार भरने लगी है....इस मुंबई की छाती पर हमेसा गुलाल उड़ा करते थे पर अब इस मुंबई की छाती पर खून की होली बहनी शरू हो गयी है...इस मुंबई ने कई रोते हुए को हँसना सिखया आज यही मुंबई खुद मैं रो रही है...आज मुंबई को उसके इस हाल पर छोड़ने के लिए कहीं न कहीं आम इन्सान से लेकर राजनेता तक जिम्मेदार है...आज मुंबई के दर्द को समझने वाला ओर उसके जख्मो के बारे मैं पूछने वाला कोई नहीं है...पर कहीं न कहीं मुंबई का दर्द सिर्फ ओर सिर्फ मुंबई हमले का मुख्य आरोपी कसाब है जो उस हमले के बाद भी मुंबई मैं ही ठीक तीन साल से मेहमान के रूप मैं बसा हुआ है ओर जिसकी खातिरदारी हमारी सरकार कर रही है....आज मुंबई को दर्द है तो इस बात का की आज उसके ओर उसके अपनों पर हमला करने वाला भी चैन से जी रहा है....आज मुंबई का दर्द उसे खुश होने से रोक रहा है!!! आज मुंबई की बस इतनी शिकायत है की अब तो उसके छाती पर चोट पहुँचाने वाले दरिन्दे को ऐसी चोट मिले की मुझपर ओर मेरे अपनों पर अगली चोट देने से पहले उन दरिंदो का रूह काँप जाये...सियासत की आंच मैं मुझे ओर आम इंसान को मत धकेलो क्यूंकि हम तंग आ चुके है अपनों को खो खो कर हम तंग आ चुके है बेगुनाहों की लाशें देखते देखते ...हम तंग आ चुके है इस चोट से ..अब तो मेरे जख्मो पर मरहम लगाओ....ओर हो सके तो उस दरिन्दे को भी फाँसी पर लटकाओ...

हाँ मैं हु जिन्दा मगर मेरा जख्म अभी भरा नहीं..क्यूंकि देश को चोटिल करने वाला अभी तक..................

1 टिप्पणी:

  1. पुनीत भाई बहुत अच्छा लिखा है सच मानो तो मुंबई अपने आपसे खुद कहा रही की मुझे बचा लो वरना इंसानियत के ये दरिन्दे मुझ पर खून की होली खेलेंगे ...... सच मान मै तो सहम गया .तेरा लेख पढ़कर ... लेकिन बहुत अच्छा...... स्वागत है अच्छे लेख के लिए......ऐसे ही लगे रहो

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